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देश की पहली और विश्व की सबसे बड़ी हाइड्रोजन ट्रेन पर अभी सवालिया निशान

हाइड्रोजन प्लांट में नहीं तैयार हो पा रही हाइड्रोजन गैस, ट्रेन के संचालन की समय सीमा लगातार बढ़ रही

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Hydrogen Train : देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना से जुड़े प्लांट में फिलहाल उत्पादन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है। पानी से आवश्यक मात्रा में गैस नहीं निकलने से संचालन प्रभावित हो रहा है। इस कारण रेलवे को ट्रायल और आवश्यक संचालन के लिए पुणे और चेन्नई से टैंकरों से हाइड्रोजन गैस मंगवानी पड़ रही है। इससे परियोजना की संचालन व्यवस्था प्रभावित हो रही है। जिससे रेलवे की समय-सीमा प्रभावित हो रही है।

हाइड्रोजन ट्रेन के पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) संचालन के लिए जींद में एक विशेष प्लांट लगाया गया है। हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए जींद स्थित प्लांट में पानी से इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए हाइड्रोजन गैस तैयार की जानी थी लेकिन प्लांट में गैस उत्पादन क्षमता उम्मीद के अनुरूप नहीं पहुंच पाई है। तकनीकी दिक्कतों के कारण पानी से उतनी मात्रा में हाइड्रोजन गैस अलग नहीं हो पा रही है जितनी ट्रेन के सुचारू संचालन और परीक्षण के लिए जरूरी है। प्लांट अपनी तय उत्पादन क्षमता के बेहद निचले स्तर पर काम कर रहा है।

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देश की पहली और विश्व की सबसे बड़ी हाइड्रोजन ट्रेन की खासियत यह है कि यह ट्रेन पूरी तरह भारत में बनी है। चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में इसे तैयार किया गया है। इसमें इस्तेमाल की गई तकनीक भी भारतीय इंजीनियरों की मेहनत का नतीजा है। यह ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत का बेहतरीन उदाहरण है। इस हाइड्रोजन ट्रेन में एक साथ 2600 से ज्यादा यात्री सफर कर सकते हैं। इतनी बड़ी क्षमता इसे खास बनाती है। इससे ज्यादा लोगों को एक साथ सफर की सुविधा मिलेगी और भीड़भाड़ कम करने में भी मदद मिलेगी।

भारत ने 10 कोच वाली हाइड्रोजन ट्रेन तैयार की है, जो दुनिया में अपनी तरह की सबसे लंबी ट्रेन मानी जा रही है। इसमें 8 डिब्बे यात्रियों के लिए हैं और 2 डिब्बे इंजन की तरह काम करते हैं। इतनी लंबी हाइड्रोजन ट्रेन पहले कहीं नहीं बनी है। इस ट्रेन का इंजन भी बहुत ताकतवर है। इसकी कुल क्षमता 2400 किलोवाट यानी करीब 3200 हॉर्सपावर है। दोनों पावर कार मिलकर ट्रेन को अच्छी रफ्तार और ताकत देती हैं। इससे ट्रेन भारी लोड और ज्यादा यात्रियों के साथ भी आसानी से चल सकती है।

यह ट्रेन पर्यावरण के लिए बिल्कुल सुरक्षित है। इसमें हाइड्रोजन फ्यूल का इस्तेमाल होता है, जिससे धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती। सिर्फ पानी की भाप निकलती है, जो सेहत और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं है। इस ट्रेन का ट्रायल पूरी सुरक्षा के साथ किया गया। लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से इसे चलाकर देखा गया। ब्रेक, फ्यूल सिस्टम और बाकी सभी जरूरी चीजों की जांच की गई और सभी टेस्ट सफल रहे। सफल ट्रायल के बाद ग्रीन एनर्जी की तरफ भारत ने मजबूत कदम बढ़ा दिया, लेकिन जींद में स्थापित किया जा रहे हाइड्रोजन गैस प्लांट में इस पर बड़ा सवाल या निशान और ब्रेक लगा दिया है।

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अगर सब कुछ ठीक हो जाए तो इस उपलब्धि के बाद भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो सकता है, जहां हाइड्रोजन ट्रेनें चल रही हैं। जर्मनी, जापान, चीन और फ्रांस जैसे देशों के साथ अब भारत भी खड़ा है। इस ट्रेन के सफल संचालन के साथ ही सरकार आगे 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना बना रही है, जिससे भारत इस क्षेत्र में और मजबूत बनेगा, लेकिन रेलवे और भारत सरकार की पूरी योजना जींद में बना रहे हाइड्रोजन प्लांट की सफलता पर निर्भर करेगी।

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